Thursday, 12 March 2015

॥॥॥॥ नास्तिक वादाचे खंण्डन ॥॥॥॥॥

नास्तिक होनेके वास्ते समस्त ग्रंथका अध्ययन करिके बडा विचार होना ओर आस्तिक होनेकोभी समस्त ग्रंथका अध्ययन करिके बहोत विचारपूर्वक ज्ञान होना चाहिये .इस कालमें जो नास्तिक या आस्तिक है उनका ज्ञान द्विकोटिक होवे है. द्विकोटिक ज्ञानको संशय कहते है. अंधार मे यह स्थाणू (ठूँठा) है या पुरुष है ऐसा जो संशय होवे है तिसको द्विकोटिक ज्ञान कहते है. द्विकोटिक ज्ञान मे संशय रहता है. किसीको निश्चय होता नहीं है. पूर्वकालके नास्तिक बड़े विचारवान् थे. उनके चार प्रकार है. सौंत्रांतिक, माध्यमिक, योगाचर और जैन. इन समस्त नास्तिकनमें अनंत भेद है. कोई ईश्वर और स्वर्ग ,नरक मानते नहीं है;जगत् सत्य मानते है. कोई ईश्वर ,स्वर्ग,नरक मानते है, पाप-पुण्य नहीं मानते. कोई पाप-पुण्य मानते है,लेकिन स्वर्ग ,नरक,ईश्वर, नहीं मानते है. कोई स्वर्ग ,नरक, पाप-पुण्य ,ईश्वर मानते है पर जीव मानते नहीं है. कोई पाप-पुण्य ,ईश्वर, जीव मानते है,परंतु स्वर्ग नरक नहीं मानते है.और कोई कुछभी नही मानता है. इन समस्त नास्तिकोंके मतोंका निराकरण करनेके वास्ते भगवान न प्रतिज्ञा करी है.कोई पुरुष चमत्कार के बिना परमेश्वर नाहि मानते.इनको विचार नाही रहता है.विचारसे ऎसा दिखता है कि परमेश्वर के बिना जगत मे कोई पदार्थ नाही है.समस्त नास्तिकनका यह मत है,की जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है.जो आखियोंको दिखता वही पदार्थ है.जो न दिखे वह नहीं है.यह चार्वाकनका सिध्दांत है.ऎसे जो नास्तिक होवे है,उनका  प्रत्यक्ष प्रमाण के उपर पाया (आधार) है. इनको  प्रत्यक्ष होना चाहिए.ऎसे नास्तिकनका खंडन करनेकेवास्ते मै तैयार हूँ.परंतु बैरी होना पर दयावान होना,वैसा नास्तिक होना पर विचारी होना चाहिए.उनका खंडन करनेके वास्ते भगवान ने प्रतिज्ञा करी है.इस प्रतिज्ञा में उनका अभिमान नहीं है.काहेते?अपने पास दो पैसे है ,और मेरे पास दो पैसे है ऐसा कहे तो वह अभिमान नहीं है.वरन् अपनेकने पैसे नहीं होके है कहना यह अभिमान है. मै पहलेहि कह चुका हूँ,की इस इंग्लिश राज मे यथार्थ करिके कोई नास्तिक नहीं है.पूर्वकालिन जो चार्वाक थे उनका कहना ऎसा है,कि 'नस्वर्गोनापवर्गोंनैवाऽऽत्मोपारलौकिकः ।। नैववर्णाश्रमादिनां क्रियाश्च फलदायिकाः ॥१॥ अग्निहोत्रं त्रयोवेदा।स्त्रीदंडं भस्म गुंठनं ॥ बुध्दि पौरूष हीनानां जीविका धातृ निर्मिता ॥२॥ यावज्जीवेत्सुखं जीवेदृणंकृत्वाघृतंपिबेत ॥ भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥३॥ वे कहतेहै कि ईश्वर ,नरक,स्वर्ग मोक्ष यह कुछभी नाही हैं.सब झुठ है,इस जगत मे जो जन्मा है तो खावे,पीवे,ओर मजा करे.देह तो भस्मीभूत होय जावे.पीछे कौन रहता है. इस प्रकारका चार्वाकनका सिध्दांत है.समस्त नास्तिकनका आधार प्रत्यक्ष पर है.इंन्द्रियनते ज्ञान होनेसे प्रत्यक्ष कहतेहै .अपने मतनमें तथा परकीय मत मे यही सिध्दांत प्रचलित है.आंग्लमत मे इसीको (perception) याने इंन्द्रियार्थ सन्निकर्षज्ञान कहते है.इसी सिध्दांत के उपर वे कहतेहै ,देहते भिन्न आत्मा होवे तो वह दिखता नाही है.पाप-पुण्यभी नाहि है. पुनर्जन्म नाही है. ईश्वर भी दिखता नाही है. पुनर्जन्म होता तो उसकी स्मृति रहनी चाहिये. कल रोटी खाई थी यह जैसी स्मृति रहती है तैसी पुनर्जन्मकीभी याद रहनी चाहिये .वह स्मृति नहीं रहती तातें पुनर्जन्म नही है,पाप-पुण्य नही है.क्योंकि उनकी प्रतीती नहीं होवे है ओर मरनेके उपरान्त कुछभी नाहि रहता है. पुनर्जन्म , पाप-पुण्य, संपूर्ण धर्म , वेद वगैरे सब झुठ है. ' त्रयोवेदस्य कर्त्तारः भंड धूर्त निशाचरः ॥ जर्फरी तुर्फरीत्यादि पंडिताना वचस्मृतः ' जिनको खानेको नहीं मिलता था ऐसे मूढ ओर बलहीन लोगोंने ढोंगसे तीन वेद निर्माण करे है. ऐसे नास्तिक कहते है '' देहिनोऽस्मिन्यथा  देहे कौमारं यौवंनं जरा । तथा देहांतर प्राप्तिर्धीरस्तत्र नमुह्यति ॥'' अपने सिध्दांतका यथार्थ करिके निरूपण करनेकेवास्ते भगवान कहते है - हे पार्थ ! धीर पुरुष जो होते है, वे नास्तिकनके मतोंको भुल के मोहवश नाही  होते  है. जे पुनर्जन्म मानते नहि ,प्रत्यक्षही मानते है.उनको ऐसा पूछना कि अगर तुम प्रत्यक्ष ही मानते हो तो तुम्हारे पिताको पिता था यह काहे परसे ? तुम्हारा आजा भी झुठा होना ,क्योकि वह दिखता नहीं .अबके नाने एक नियतिवाद निकाला है. नियति का अर्थ सृष्टिनियम .इसका मतलब ऐसा है कि,सृष्टि मे एक वस्तु होवे तो दूसरी होती है ओर एक वस्तू नहीं होवे तो दूसरी भी नही होना .इसको सहचार (Agreement) ओर व्य भि चा र (Difference) कहते है. जहॉं धूम (धुआ) है वहा अग्नि है, यह सहचा र है. जहॉं अग्नि भी नही वहॉं धुआ भी नहीं यह व्यभिचार हुआ.यह नियतिवाद समीचीन नाही है. काहेते? यह नियति को जाननेहारा कोई है या नही? जैसे संपूर्ण वस्तु सुर्यप्रकाशसे दिखती है वैसे यह नियति मे भी कोई नियामक होना चाहिये. जड पदार्थ मे नियति माने , तो वृक्षादिकभी जड है. फिर पाषाणादिक ओर धातू आदिक जड पदार्थोंसे स्वतंत्र कार्योत्पत्ति होना चाहिये . फिर पत्थरोंने भी बोलना चाहिये . वायुमात्रसे भाषण होवे ऐसा माने तो रबरकी पुतली मे वायु भरके भाषण होवे नही. तो उसमे मन नही होनेते वह भाषण नहीं कर सकती ऐसा कोई कहे तो, मन जड है कि चेतन है? मन चेतन है, जड नही है. मन कबूल हुआ तो फिर आत्माहि कबूल हुआ. फिर प्रत्यक्ष प्रमाण कहॉं रहा? जड पदार्थ मे नियति है यह तु काहते मानता है? तेरेको दिखता है यही इसमें प्रमाण है? दूसरा अगर तू प्रत्यक्ष प्रमाणही मानता तो तेरेको मन है या नही? है,तो कैसा है? मन प्रत्यक्ष दिखता नही है, फिर मन है काय परसे? सृष्टिनियम प्रत्यक्ष दिखता है. अग्निसे जलता है, यह हजार दफा देखनेसे मालुम होता है. वैसा अपना मन चीर के नहीं देखा जाता वा फाड के भी देखा नही जाता. तो मन जगत् मे ही नही है ऐसा नास्तिकोंने मानना चाहिये. मनको नाहि माने तो उस मूढ को पूछना की , निद्रामें रहकेभी व्यवहार कर. निद्रामें मन लीन होनेसे कुछभी व्यवहार नहीं होता है. उसको फिर पूछना कि , प्रत्यक्ष प्रमाण मानेगा तो सुखदुःखभी नही होना क्यों कि वो प्रत्यक्ष नहीं है. इस जगत मे किसी पदार्थ का स्वभाव सुख नही है ओर सुख तो सबको चाहिये ओर दुःख किसीको भी नही   होना . जितना प्रत्यक्ष जगत तिसमें किसी प्रत्यक्ष पदार्थ स्वभाव सुखदुःखभी नाहि होवे है ओर चींटींसे लेकर ब्रम्हदेव तक संपूर्ण जीवोंको सुखकी ही अपेक्षा है. अगर इस जगत मे किसी पदार्थ का स्वभाव सुख होवे तो वह पदार्थ जितना जितना बढ़ेगा उतना सुखभी बढ़ना चाहिये ओर वह पदार्थ घटनेसे सुखभी घटना चाहिये . अग्नि बहुत बढ़े तो जलाय देता है ओर पानी बढ़े तो डुबाय देता है. तैसा सुख किसी पदार्थ का स्वभाव होवे तो उस पदार्थ का अधिक सेवन करनेसे सुख अधिक होना चाहिये . भोजन मे सुख है तो चाहे उतना भोजन कर लेना , वैसा नहीं बनता. अधिक भोजन करनेसे दुःख होता है. फिर कबुल करो कि, भोजन मे सुख नही है. मैथुन का स्वभाव सुख होवे तो अत्यंत मैंथुन से क्षय होवे है. अग्निका स्वभाव ऊष्णता होनेसे अग्नि बढ़े वैसी ऊष्णता भी बढ़ती है. वैसा मैथुनका स्वभाव सुख नही , क्योकि अत्यंत स्त्रीसंग से क्षय होता है. इसवास्ते स्त्रीसंगका स्वभाव सुख नही है. मधुर भक्षण का स्वभाव सुख होवे तो शक्कर बहुत खानेसे कडुआ मुॅंह नही होना. तात्पर्य:--- जो स्वभाव जिस पदार्थ का होवे तिसके बढ़नेसे उसका स्वभाव बढ़ना चाहिये . यह बात एक उदाहरण से संपूर्ण पदार्थोकें वास्ते जान लेना चाहिये तिसपरभी सुख कोई पदार्थ मे है ऐसा किसीका मत होवे तो फेरि कहना , मै खंडन करनेको तैयार हूँ. इस जगतका स्वभाव सुख नही होकर भी जो उसमें सुख मानते है वे मुर्ख पुरुष अपने आग्रह से ही दुःख को प्राप्त होते है. परिमित विषय सेवन करनेसे सुख होता है, ऐसा कोई कहे सोभी बने नही . काहेते ? परिमित क्या है? मन के माने सो परिमित है, या गणित के मानेसे परिमित है? शरीर निर्वाह होने पुरताही विषय का सेवन करना ; इसीका नाम परिमित है यह भी सिध्दांत बने नही. यह मुर्खताका सिध्दांत है. काहेते ? इसमें अन्योन्याश्रय दोष है. किसीने कहा , रूपया लाव. रूपये कहॉं है? पेटीमें है .पेटी कहॉं है? तो जहॉं रूपये रखे है वहॉं . किसीने कहा मोतीराम के घर जाव . मोतीराम का घर कहॉं है? तो मोतीराम है वहॉं है. ओर मोतीराम कहॉं है? तो घर है, वहॉं है. ऐसा , शरीर काहेसे चलता है? तो परिमित विषय सेवन करनेसे , ओर परिमित विषय सेवन काहेको करना तो शरीर निर्वाह होने पुरता विषय सेवन करनेको . इस लक्षण से परिमितका निश्चय नाहि होवे है. हमने पुर्व  परिमित शब्द के दो अर्थ करे थे . मनके माने वह परिमित कि मापन करना यह परिमित ? कोई कहेकि, रोज दो रोटी खाना यह परिमित है. तो उनको फिर पुछो , दो रोटी खाना परिमित है या तृप्ति होवे इतना खाना परिमित है? दो रोटी खाना यह परिमित है, तो अजीर्ण होने पर भी दो रोटी क्यों नही खाता? मन के तृप्ति को परिमित कहे तो परिमितका स्विकार व्यर्थ है. ओर मन की तृप्ति होवे उसकाही नाम सुख कहना चाहिये . मनको सुख होवे ,वही सुख है. इसप्रकार से ईस जगत् के दृश्य पदार्थनते सुख नाही होवे ओर उनका स्वभाव भी सुख नाही है. मै फेरि फेरि कहता हूँ, कि दृश्य पदार्थ न में सुख होवे तो फिर प्रचोदन करो. फिर भी मै इसका खंडन करूँगा . यह मेरा अभिमान नही है, मेरेसे खंडन नही हुवा तो नही करूँगा . परंतु असत्य भाषण नही करूँगा . मै विनोदमें भी असत्य भाषण नही करता हूँ. सुख मनोमात्रका स्वभाव है. मन दिखता नही है ओर सुख भी दिखता नही है. यह नास्तिक तो प्रत्यक्ष प्रमाण मानते है, तो इन्होंने सुख इच्छा नही करनी चाहिये . ओर इच्छा करे, तो फिर आत्माको कबूल किया . कदाचीत सृष्टिनियम से ही सब होना ऐसा कोई कहे तो यह बने नही . यह रेलगाडी भाप से चलती है तो उसे चलनेको इतनीही भाप रहना यह भाप नही सिखाती , यह समझनेहारा कोई दुसरा होना . बुध्दीमान प्राणी ही ऐसा कहेगा . गणित सिध्दांतसे भी यह सिद्ध होता है कि, बुध्दी जानती है, जड नही जानता जगत् मे जो पानी बनाया गया वह एक आउंस ऑक्सिजन ओर दो आउंस हैड्रोजन मिलनेसे बना हुवा है. (H2O) Chemistry रसायन शास्त्र में समष्टि प्राणको ऑक्सिजन कहते है. समष्टि व्यान को हैड्रोजन कहते है. समष्टि उदान को स्टीम कहते है. जलवाष्प पानीके भाप को कहते है. समान वायू के विषयमें सायन्समें विचार किया नही है. तब जड पदार्थनमें बुध्दि नही है ओर बुध्दिबिन गणित रहता नही है. जैसे एक,दो,तीन ऐसे तीन पदार्थ है. वे पदार्थ अपनेको नही जानेंगे, वरन्  बुध्दि जानेगी. अब मै गणितकी रितीसे ईश्वर सिद्ध करता हूँ .इसका कोई खंडन नही कर सकता . गणित बुध्दि के बिना रहता नही .अब जगत् मे जब पानी उत्पन्न हुवा , तो वह पानी दो माप हैड्रोजन ओर एक माप ऑक्सिजन मिलके बना या नही? यह कैसे बना? सृष्टिनियम से बना ऐसा माने तो ऑक्सिजन वा हैड्रोजन ये जो जडपदार्थ है, इनको बुध्दि मानना चाहिये ; नही तो बुध्दिवंत ने बनाया ऐसा मानना चाहिये. बुध्दिवंत माने तो जीव से यह बने नही क्योंकि जीव अल्पज्ञ है. तो वह बुध्दीवान् कोई तो भी जीव से   बडा होना चाहिये .वही हमारा ईश्वर है. इसप्रकार करके धीर पुरुष जो होते हैं वे नास्तिकनके मतोंको देखिके मोहको नाहि प्राप्त होते हैं. काहेते ? वस्तू प्रत्यक्ष भी हुई तो वह आठ प्रकार के खटकेसे याने प्रतिबंधसे दिखती नही . इसवास्ते वह नहीसी नही होती . ---=:: का रि का ::=--- १अतिदूरात्सामिप्यात्२ । ३ इन्द्रियघातान्मनोनवस्थानात् ४ ॥ अतिसूक्ष्मात् ५ । ६व्यभिचारादभिभवात् ७ । समानाभिहाराच्च ८ ॥१॥ १. ) अतिदूरात् :- पदार्थ अत्यंत दूर होनेसे दिखता नही .यह दूर त्वरूपी खटका हैं. तुम्हारा पुत्र घरमें है,परंतु यहाँसे तो दिखता नही ; तो क्या वह नही कहना चाहिये ? २.) सामिप्यात् :- अति नजीककी भी वस्तू दिखाई देती नही हैं. आँखोंमेंका अंजन दिखता नही. जो मूढ़ , दिखती वही वस्तु हैं , तो अंजन भी दिखना चाहिये . नही तो उसके आँखिमें अंजन नहीं कहना चाहिये . ३.) इन्द्रियघातात् :- इन्द्रियका घात होना यह भी एक खटका है. कान फूटा होवे तो शब्दको नाहि सुनता हैं. यह नास्तिकनका ओर एक संशय है. वे कहते हैं, कि हमको नहीं दिखा तो क्या हुवा , किसीको तो भी दिखता हैं या नहीं ? तो उनको ऐसा पूछिये कि दूसरेको दिखा तो तुमको क्या प्रमाण ? वे कहेंगे कि, उसका कहना प्रमाण है तो यह शब्दप्रमाण हुवा . प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हुवा । भला , तेरा मन तेरेको दिखता हैं या नहीं ? तेरेको तेरा मन दिखता नही ; वैसा किसीको को भी दिखता नहीं तो फिर मन हैं या नहीं ? मनको कबूल किया तो तू आस्तिक हुवा . ४.) मनोऽनवस्थानात् :- अपना ख्याल पदार्थनके ऊपर नहीं रहनेसे वस्तू होकर भी दिखती नही. इस वक्त तुम्हारा ख्याल मेरे तरफ था . तो किसीने ऊधर सरौता बजाया तो तुमको सुननेमें नहीं आया. ५.) अतिसूक्ष्मात् :- अति सूक्ष्मभी वस्तू होवे तो नहीं दिखती हैं . भाप होकर जब जल उड़ जाता हैं , तब सूक्ष्म होनेसे दिखता नहीं . ६.) व्यभिचारात् :- देर लगनेसे पदार्थ समझता नहीं . जैसा " घी दे " इस वाक्यको देरसे कहनेसे अर्थ कब समझेगा? "घी" कहॉं आज ओर "दे" कहॉं कल तो घरमें घी होते भी अर्थ न समझनेसे नहीं मिलेगा क्योंकि उसमें देर बहुत हुई. ७.) अभिभवात् :- दब जानेसेभी वस्तू दिखती नहीं . जैसे डब्बे में शक्कर रखी तो उपर ढक्कन होनेसे नहीं दिखेगी.  ८.) समानाभिहाराच्च :- दो पदार्थ समान होनेसे भी दिखता नहीं . जैसा तुम भी गाते हो ओर दूसराभी गाता हैं ओर तुम्हारा गला ओर दूसरेका गला समान होवे तो समझता नही.  ये आठ प्रकारके खटके परमेश्वर समझनेमे हैं . परमेश्वर है, परंतु इन आठ खटकोंमेसे किसी प्रकारका खटका रहनेसे दिखता नही. इन समस्त युक्तियनके मध्य एक युक्तिका खण्डन कोई नास्तिक नही कर सकता. इस युक्तीका खण्डन करनेहारा नास्तिक भूतकालमें हुवा नहीं , भविष्यकालमें होवेगा नहीं ओर वर्तमानकालमें विद्यमान नहीं . वह युक्ति यह हैं.:::===---****====---- "कौनसा भी पदार्थ हैं कहनेको उसकी पहिचान चाहिये , वैसा नही कहनेको भी पहिचान चाहिये . जिसकी पहिचान नहीं वह पदार्थ है या नहीं है ऐसा कोई भी नहीं कह सकता . जैसा तुम्हारा छोकरा हैं . उसकी तुमको पहिचान हैं. वह छोकरा यहाँ दिखता नहीं इसवास्ते नहीं ऐसा नहीं. वह यहाँ दिखता नहीं , पर हैं. तैसा ईश्वर नाहि कहनेवालोंको पूछे कि, तुमको ईश्वर का ज्ञान हैं या नहीं ? हैं कहे तो वादही नहीं . नहीं कहे तो ज्ञानही नहीं तो नही कैंसा कहता? एवं परमेश्वर नाहि कहनेवाले समस्त नास्तिकनके मतनका खण्डन किया.  अब जो पुनर्जन्म नही मानते ओर आत्माको नहीं मानते हैं तिन नास्तिकनको खण्डन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं. जो ऐसे मूढ़ हैं कि पुनर्जन्म नहीं मानते उनको पूछे कि, जो तुम पुनर्जन्म नाहि मानते तो या जगत् में जो जो पदार्थ उत्पन्न भया हैं. उसको कुछ कारण हैं या बिनाकारण वह उत्पन्न भया हैं? जो मूढ़ कहे की , बिनाकारण ही सब उत्पन्न हुवा तो बिनाभोजन तृप्ति होना चाहिये , बिना मैंथुन प्रजा होनी चाहिये, या बिना जलपान प्यास जाना चाहिये , ऐसा क्यों नही होता? तो कारण मानना चाहिये . कारणसे उत्पत्ति हैं, तो उसको फिर पूछे ==- कारणसे जो कार्य उत्पन्न होवे तो कैंसा होवे? मूल कारणमे शक्ति नहीं   होते कार्य होता तो बालुकासे भी तेल निकलना चाहिये या खंभेसे भी भैंस होना चाहिये ? वह तो नही होती तो फिर कारणमें शक्ति होना कबूल करो. कबूल नहीं करेगा तो पूर्वोक्त दोष आवेंगे फिर बालुकासे तेल निकलना चाहिये . तमाखूके बीजसे आमके झाड़ उगना चाहिये . कोई कहे कारण मे शक्ति है तो दिखती क्यो नही? वह शक्ति कारणमें अभिभूत हैं. याने छिपी है. करके दिखती नही. डब्बमें ढक्कन लगा हैं. तो पदार्थ दिखता नही. वैसा , फेरि जो आत्मा नही मानते उनको पूछें की , बालक जब उत्पन्न होता तो उस बालकमें आत्मा है या नही ? आत्मा नही तो दूध पीनेका ज्ञान उनको नहीं होना. बिना आत्मा दूध पीनेकी इच्छा नहीं होती , इसवास्ते आत्मा मानना अवश्य हैं . आत्माको माना तो पूर्वसंस्कार भी मानना चाहिये . पूर्वसंस्कार नहीं रहा तो ज्ञानभी नहीं रहता . यह दुर्गा मालपुआ बनाना नही जानती क्योंकि पूर्व अनुभव नही. वैसे पूर्व अनुभव बिना बालकको दूध पीनेकी शक्ति कैसी आवेगी ? पूर्व अनुभव बिना शक्ति माने तो बिना भोजन तृप्तिकी नाई दोष आवेगा . कोई कहेगा कि पूर्व जन्म है तो स्मृति क्यो नही. तो उसको हम पूछते है कि, बालपन के खेल भी याद नहीं आते , तो बालपन भी नहीं मानना चाहिये . तात्पर्य श्रुतिमाताके सामने खड़े रहनेकी किसीकी भी शक्ति नही है. यह बड़े विचारी नास्तककी बात हुई . सब शास्त्रनको जानके जो नास्तिक भये तिनकी बात हुई.अब आधे नास्तिक का खंडन करता हूँ. इस इंग्लिश राज्यमें जो नास्तिक है वे समस्त आधे नास्तिक ही है. कोई पूरा नास्तिक होवे तो सामने आना . वाद करनेको मै तैयार हूँ. आधे नास्तिकनकी चमत्कार के ऊपर निष्ठा होती है. उनका सिध्दांत ऐसा है कि, चमत्कारसे हम ईश्वर मानेंगे . उनको हम पूछते है कि, चमत्कार नाम काहेगा है. जो एक आदमीको आवे उसका नाम चमत्कार है या बहुत आदमी को आवे तिसका नाम चमत्कार है? सर्वथा ? लौकिक वस्तुका नाम चमत्कार है या सर्वथा अलौकिक वस्तुका नाम चमत्कार है. या कोई लौकिक ओर अलौकिक वस्तुका नाम चमत्कार है. वा सर्व अभाव का नाम चमत्कार है? थोडी जगह में जो वस्तु व्यापक है उसीको लोग चमत्कार कहते है. वही वस्तु बहुत व्यापक होनेसे चमत्कारत्व नष्ट होवे है. जैसे है- कृत्रिम बिजली के दिपक(electric lamp) को देखकर लोग चमत्कार को प्राप्त होते है. वरन् ऐसे हजारो बिजली के दीपकमेभी सूर्यप्रकाश बहुत बढ़ कर है. परंतु वह चमत्कार नहीं मानते. काहेते ? सूर्य रोज देखनेकी टेव पड़ गई है . तो बडे वस्तुका नाम चमत्कार नहीं है. कोनेमे पडे हुवे कोई क्षुल्लक वस्तुकाही नाम चमत्कार है.   

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