सनातन आर्य धर्म : वर्तमानातच शाश्वत आनंद प्राप्त करणारा धर्म जगात अनेक धर्म आहेत पण धर्माचे मुलतत्व आनंद वर्तमान काळातच देणारा असा एकमेव धर्म सनातन आर्यधर्मच आहे.मग याचा अर्थ इतर धर्म आनंद देत नाहीत का ? माझ्या मते तात्पुरता आनंद देत असतीलही पण महत्त्वाचे हे आहे कि शाश्वत आनंद वर्तमानातच ते नाही देऊ शकत. वास्तविक तर्कदृष्ट्या पाहिले तर जोपर्यंत मी व माझे शरीरासंबधाने जे सहअस्तित्व आहे आनंद ही त्याला धरुनच असावयास हवा .मला ताप आहे आणि औषधी दुसऱ्या कोणत्याही शरीराला दिली तर काही माझा ताप जाणार नाही तर माझ्या शरीरातच ती औषधी घेण्याने जाणार.तसेच धर्माचेही आहे वर्तमान शरीर आपणास दृश्य आहे आणि जे शरीर आता इथेही सुक्ष्मशरीर ही संकल्पना सुध्दा फक्त आर्य धर्मातच आहे .बाकीच्या धर्मात आता स्थुलशरीर कष्ट पावत असले तरी पुढे हेच मृत झालेले स्थुलशरीर जीवंत केले जाईल याचा कालावधी मनुष्याच्या कालावधीपेक्षा भिन्न आहे ,काहीच सांगता येत नाही की किती काळ ? बस् फक्त मृत पडुन जाण्याशिवाय काही करता येत नाही. आता आर्यधर्मात याच्यापेक्षा एक वेगळी संकल्पना आहे ती म्हणजे या स्थुलशरीरातच सुक्ष्मशरीर आहे तेच स्थुलशरीर मृत झाले कि सुक्ष्मशरीरच आनंद पावते. पण ही गोष्ट थोडी बाजूला ठेऊ यात.ज्याला आपल्या सुक्ष्मशरीराचा साक्षात झाला त्यालाच हा आनंद मिळणार यात काही वाद नाही. पुन्हा आनंद मिळत असला तरी असे सुक्ष्मशरीर आणि त्याच्या अनुभवाचा प्रदेश म्हणजे काही हे स्थुलशरीर नव्हे.वास्तविक विवेकबुध्दीने पाहिले तर सुक्ष्मशरीर ज्यात मनाची तत्व प्रधानता अधिक असते शरीर संपले तरी मन संपत नाही आणि मन संपले तरी शाश्वत आत्मतत्व संपत नाही व आपणाला शरीर व मन या दोघांसहीत वर्तमान काळातच शाश्वत आनंद शोधायचा आहे आणि जगात फक्त सनातन आर्यधर्माशिवाय इतर कोणताच धर्म आपणास अशाप्रकारचा शाश्वत आत्मतत्वाचा आनंद देत नाही . आर्यधर्मातच हा मार्ग आहे यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कुतश्चनेति। एतं ह वाव न तपति । किमहं साधु ना करवम् किमहं पापमकरवमिति। स य एवं विद्वानेते आत्मानं स्पृणुते उभे ह्येवैष एते आत्मानं स्पृणुते । य एवं वेद। इत्युपनिषत्॥ (तैत्तरीय उपनिषद १२-४-१) त्या (ब्रम्ह) तत्वाला न प्राप्त करताच जिथून वाणी, मनइंंद्रिंयासहित परत माघारी फिरते .त्या ब्रह्माच्या आनन्दाला जाणणारा कशामुळेही भयभीत होत नाही .त्या विद्वानाला मी शुभ कर्म का केले नाही ? मी पाप कर्म का केले? अशाप्रकारची चिन्ता , सन्तप्त करत नाही. (पाप आणि पुण्यालाच तापाचे कारण मानणारा ) जो विद्वान आपल्या आत्म्याला प्रसन्न (आनंदित) ठेवतो त्याला या दोन्ही गोष्टी आत्मस्वरूप दृष्टीस पडतात. जो याप्रकारे अद्वैत आनन्दस्वरूप ब्रह्माला जाणतो अशाप्रकारची ही उपनिषद् (रहस्यविद्या) आहे .(विनोद मराठे)
या ब्लॉगचा उद्देश आर्य धर्माची सत्य ऒळख व्हावी या सद्हेतुस्तव झाला आहे .येथे कोणत्याही अन्य धर्माची तत्वमुल्यं अपमानीत करणे हा या ब्लॉगचा हेतू नाही . कोणत्याही विशेष जातीसमुदायाला किंवा धर्माला विरोध करून द्वेष पसरवणे हा संकुचित दृष्टिकोन नाही .तर सर्व धर्माचा समन्वय साधुन परस्पर विद्वेषाची भावना नष्ट करून बंधुत्व वाढीचा प्रयत्न करणे हा आहे. कृण्वंतो विश्वंमार्यम् !!!
Monday, 28 December 2015
Thursday, 12 March 2015
॥॥॥॥ नास्तिक वादाचे खंण्डन ॥॥॥॥॥
नास्तिक होनेके वास्ते समस्त ग्रंथका अध्ययन करिके बडा विचार होना ओर आस्तिक होनेकोभी समस्त ग्रंथका अध्ययन करिके बहोत विचारपूर्वक ज्ञान होना चाहिये .इस कालमें जो नास्तिक या आस्तिक है उनका ज्ञान द्विकोटिक होवे है. द्विकोटिक ज्ञानको संशय कहते है. अंधार मे यह स्थाणू (ठूँठा) है या पुरुष है ऐसा जो संशय होवे है तिसको द्विकोटिक ज्ञान कहते है. द्विकोटिक ज्ञान मे संशय रहता है. किसीको निश्चय होता नहीं है. पूर्वकालके नास्तिक बड़े विचारवान् थे. उनके चार प्रकार है. सौंत्रांतिक, माध्यमिक, योगाचर और जैन. इन समस्त नास्तिकनमें अनंत भेद है. कोई ईश्वर और स्वर्ग ,नरक मानते नहीं है;जगत् सत्य मानते है. कोई ईश्वर ,स्वर्ग,नरक मानते है, पाप-पुण्य नहीं मानते. कोई पाप-पुण्य मानते है,लेकिन स्वर्ग ,नरक,ईश्वर, नहीं मानते है. कोई स्वर्ग ,नरक, पाप-पुण्य ,ईश्वर मानते है पर जीव मानते नहीं है. कोई पाप-पुण्य ,ईश्वर, जीव मानते है,परंतु स्वर्ग नरक नहीं मानते है.और कोई कुछभी नही मानता है. इन समस्त नास्तिकोंके मतोंका निराकरण करनेके वास्ते भगवान न प्रतिज्ञा करी है.कोई पुरुष चमत्कार के बिना परमेश्वर नाहि मानते.इनको विचार नाही रहता है.विचारसे ऎसा दिखता है कि परमेश्वर के बिना जगत मे कोई पदार्थ नाही है.समस्त नास्तिकनका यह मत है,की जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है.जो आखियोंको दिखता वही पदार्थ है.जो न दिखे वह नहीं है.यह चार्वाकनका सिध्दांत है.ऎसे जो नास्तिक होवे है,उनका प्रत्यक्ष प्रमाण के उपर पाया (आधार) है. इनको प्रत्यक्ष होना चाहिए.ऎसे नास्तिकनका खंडन करनेकेवास्ते मै तैयार हूँ.परंतु बैरी होना पर दयावान होना,वैसा नास्तिक होना पर विचारी होना चाहिए.उनका खंडन करनेके वास्ते भगवान ने प्रतिज्ञा करी है.इस प्रतिज्ञा में उनका अभिमान नहीं है.काहेते?अपने पास दो पैसे है ,और मेरे पास दो पैसे है ऐसा कहे तो वह अभिमान नहीं है.वरन् अपनेकने पैसे नहीं होके है कहना यह अभिमान है. मै पहलेहि कह चुका हूँ,की इस इंग्लिश राज मे यथार्थ करिके कोई नास्तिक नहीं है.पूर्वकालिन जो चार्वाक थे उनका कहना ऎसा है,कि 'नस्वर्गोनापवर्गोंनैवाऽऽत्मोपारलौकिकः ।। नैववर्णाश्रमादिनां क्रियाश्च फलदायिकाः ॥१॥ अग्निहोत्रं त्रयोवेदा।स्त्रीदंडं भस्म गुंठनं ॥ बुध्दि पौरूष हीनानां जीविका धातृ निर्मिता ॥२॥ यावज्जीवेत्सुखं जीवेदृणंकृत्वाघृतंपिबेत ॥ भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥३॥ वे कहतेहै कि ईश्वर ,नरक,स्वर्ग मोक्ष यह कुछभी नाही हैं.सब झुठ है,इस जगत मे जो जन्मा है तो खावे,पीवे,ओर मजा करे.देह तो भस्मीभूत होय जावे.पीछे कौन रहता है. इस प्रकारका चार्वाकनका सिध्दांत है.समस्त नास्तिकनका आधार प्रत्यक्ष पर है.इंन्द्रियनते ज्ञान होनेसे प्रत्यक्ष कहतेहै .अपने मतनमें तथा परकीय मत मे यही सिध्दांत प्रचलित है.आंग्लमत मे इसीको (perception) याने इंन्द्रियार्थ सन्निकर्षज्ञान कहते है.इसी सिध्दांत के उपर वे कहतेहै ,देहते भिन्न आत्मा होवे तो वह दिखता नाही है.पाप-पुण्यभी नाहि है. पुनर्जन्म नाही है. ईश्वर भी दिखता नाही है. पुनर्जन्म होता तो उसकी स्मृति रहनी चाहिये. कल रोटी खाई थी यह जैसी स्मृति रहती है तैसी पुनर्जन्मकीभी याद रहनी चाहिये .वह स्मृति नहीं रहती तातें पुनर्जन्म नही है,पाप-पुण्य नही है.क्योंकि उनकी प्रतीती नहीं होवे है ओर मरनेके उपरान्त कुछभी नाहि रहता है. पुनर्जन्म , पाप-पुण्य, संपूर्ण धर्म , वेद वगैरे सब झुठ है. ' त्रयोवेदस्य कर्त्तारः भंड धूर्त निशाचरः ॥ जर्फरी तुर्फरीत्यादि पंडिताना वचस्मृतः ' जिनको खानेको नहीं मिलता था ऐसे मूढ ओर बलहीन लोगोंने ढोंगसे तीन वेद निर्माण करे है. ऐसे नास्तिक कहते है '' देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवंनं जरा । तथा देहांतर प्राप्तिर्धीरस्तत्र नमुह्यति ॥'' अपने सिध्दांतका यथार्थ करिके निरूपण करनेकेवास्ते भगवान कहते है - हे पार्थ ! धीर पुरुष जो होते है, वे नास्तिकनके मतोंको भुल के मोहवश नाही होते है. जे पुनर्जन्म मानते नहि ,प्रत्यक्षही मानते है.उनको ऐसा पूछना कि अगर तुम प्रत्यक्ष ही मानते हो तो तुम्हारे पिताको पिता था यह काहे परसे ? तुम्हारा आजा भी झुठा होना ,क्योकि वह दिखता नहीं .अबके नाने एक नियतिवाद निकाला है. नियति का अर्थ सृष्टिनियम .इसका मतलब ऐसा है कि,सृष्टि मे एक वस्तु होवे तो दूसरी होती है ओर एक वस्तू नहीं होवे तो दूसरी भी नही होना .इसको सहचार (Agreement) ओर व्य भि चा र (Difference) कहते है. जहॉं धूम (धुआ) है वहा अग्नि है, यह सहचा र है. जहॉं अग्नि भी नही वहॉं धुआ भी नहीं यह व्यभिचार हुआ.यह नियतिवाद समीचीन नाही है. काहेते? यह नियति को जाननेहारा कोई है या नही? जैसे संपूर्ण वस्तु सुर्यप्रकाशसे दिखती है वैसे यह नियति मे भी कोई नियामक होना चाहिये. जड पदार्थ मे नियति माने , तो वृक्षादिकभी जड है. फिर पाषाणादिक ओर धातू आदिक जड पदार्थोंसे स्वतंत्र कार्योत्पत्ति होना चाहिये . फिर पत्थरोंने भी बोलना चाहिये . वायुमात्रसे भाषण होवे ऐसा माने तो रबरकी पुतली मे वायु भरके भाषण होवे नही. तो उसमे मन नही होनेते वह भाषण नहीं कर सकती ऐसा कोई कहे तो, मन जड है कि चेतन है? मन चेतन है, जड नही है. मन कबूल हुआ तो फिर आत्माहि कबूल हुआ. फिर प्रत्यक्ष प्रमाण कहॉं रहा? जड पदार्थ मे नियति है यह तु काहते मानता है? तेरेको दिखता है यही इसमें प्रमाण है? दूसरा अगर तू प्रत्यक्ष प्रमाणही मानता तो तेरेको मन है या नही? है,तो कैसा है? मन प्रत्यक्ष दिखता नही है, फिर मन है काय परसे? सृष्टिनियम प्रत्यक्ष दिखता है. अग्निसे जलता है, यह हजार दफा देखनेसे मालुम होता है. वैसा अपना मन चीर के नहीं देखा जाता वा फाड के भी देखा नही जाता. तो मन जगत् मे ही नही है ऐसा नास्तिकोंने मानना चाहिये. मनको नाहि माने तो उस मूढ को पूछना की , निद्रामें रहकेभी व्यवहार कर. निद्रामें मन लीन होनेसे कुछभी व्यवहार नहीं होता है. उसको फिर पूछना कि , प्रत्यक्ष प्रमाण मानेगा तो सुखदुःखभी नही होना क्यों कि वो प्रत्यक्ष नहीं है. इस जगत मे किसी पदार्थ का स्वभाव सुख नही है ओर सुख तो सबको चाहिये ओर दुःख किसीको भी नही होना . जितना प्रत्यक्ष जगत तिसमें किसी प्रत्यक्ष पदार्थ स्वभाव सुखदुःखभी नाहि होवे है ओर चींटींसे लेकर ब्रम्हदेव तक संपूर्ण जीवोंको सुखकी ही अपेक्षा है. अगर इस जगत मे किसी पदार्थ का स्वभाव सुख होवे तो वह पदार्थ जितना जितना बढ़ेगा उतना सुखभी बढ़ना चाहिये ओर वह पदार्थ घटनेसे सुखभी घटना चाहिये . अग्नि बहुत बढ़े तो जलाय देता है ओर पानी बढ़े तो डुबाय देता है. तैसा सुख किसी पदार्थ का स्वभाव होवे तो उस पदार्थ का अधिक सेवन करनेसे सुख अधिक होना चाहिये . भोजन मे सुख है तो चाहे उतना भोजन कर लेना , वैसा नहीं बनता. अधिक भोजन करनेसे दुःख होता है. फिर कबुल करो कि, भोजन मे सुख नही है. मैथुन का स्वभाव सुख होवे तो अत्यंत मैंथुन से क्षय होवे है. अग्निका स्वभाव ऊष्णता होनेसे अग्नि बढ़े वैसी ऊष्णता भी बढ़ती है. वैसा मैथुनका स्वभाव सुख नही , क्योकि अत्यंत स्त्रीसंग से क्षय होता है. इसवास्ते स्त्रीसंगका स्वभाव सुख नही है. मधुर भक्षण का स्वभाव सुख होवे तो शक्कर बहुत खानेसे कडुआ मुॅंह नही होना. तात्पर्य:--- जो स्वभाव जिस पदार्थ का होवे तिसके बढ़नेसे उसका स्वभाव बढ़ना चाहिये . यह बात एक उदाहरण से संपूर्ण पदार्थोकें वास्ते जान लेना चाहिये तिसपरभी सुख कोई पदार्थ मे है ऐसा किसीका मत होवे तो फेरि कहना , मै खंडन करनेको तैयार हूँ. इस जगतका स्वभाव सुख नही होकर भी जो उसमें सुख मानते है वे मुर्ख पुरुष अपने आग्रह से ही दुःख को प्राप्त होते है. परिमित विषय सेवन करनेसे सुख होता है, ऐसा कोई कहे सोभी बने नही . काहेते ? परिमित क्या है? मन के माने सो परिमित है, या गणित के मानेसे परिमित है? शरीर निर्वाह होने पुरताही विषय का सेवन करना ; इसीका नाम परिमित है यह भी सिध्दांत बने नही. यह मुर्खताका सिध्दांत है. काहेते ? इसमें अन्योन्याश्रय दोष है. किसीने कहा , रूपया लाव. रूपये कहॉं है? पेटीमें है .पेटी कहॉं है? तो जहॉं रूपये रखे है वहॉं . किसीने कहा मोतीराम के घर जाव . मोतीराम का घर कहॉं है? तो मोतीराम है वहॉं है. ओर मोतीराम कहॉं है? तो घर है, वहॉं है. ऐसा , शरीर काहेसे चलता है? तो परिमित विषय सेवन करनेसे , ओर परिमित विषय सेवन काहेको करना तो शरीर निर्वाह होने पुरता विषय सेवन करनेको . इस लक्षण से परिमितका निश्चय नाहि होवे है. हमने पुर्व परिमित शब्द के दो अर्थ करे थे . मनके माने वह परिमित कि मापन करना यह परिमित ? कोई कहेकि, रोज दो रोटी खाना यह परिमित है. तो उनको फिर पुछो , दो रोटी खाना परिमित है या तृप्ति होवे इतना खाना परिमित है? दो रोटी खाना यह परिमित है, तो अजीर्ण होने पर भी दो रोटी क्यों नही खाता? मन के तृप्ति को परिमित कहे तो परिमितका स्विकार व्यर्थ है. ओर मन की तृप्ति होवे उसकाही नाम सुख कहना चाहिये . मनको सुख होवे ,वही सुख है. इसप्रकार से ईस जगत् के दृश्य पदार्थनते सुख नाही होवे ओर उनका स्वभाव भी सुख नाही है. मै फेरि फेरि कहता हूँ, कि दृश्य पदार्थ न में सुख होवे तो फिर प्रचोदन करो. फिर भी मै इसका खंडन करूँगा . यह मेरा अभिमान नही है, मेरेसे खंडन नही हुवा तो नही करूँगा . परंतु असत्य भाषण नही करूँगा . मै विनोदमें भी असत्य भाषण नही करता हूँ. सुख मनोमात्रका स्वभाव है. मन दिखता नही है ओर सुख भी दिखता नही है. यह नास्तिक तो प्रत्यक्ष प्रमाण मानते है, तो इन्होंने सुख इच्छा नही करनी चाहिये . ओर इच्छा करे, तो फिर आत्माको कबूल किया . कदाचीत सृष्टिनियम से ही सब होना ऐसा कोई कहे तो यह बने नही . यह रेलगाडी भाप से चलती है तो उसे चलनेको इतनीही भाप रहना यह भाप नही सिखाती , यह समझनेहारा कोई दुसरा होना . बुध्दीमान प्राणी ही ऐसा कहेगा . गणित सिध्दांतसे भी यह सिद्ध होता है कि, बुध्दी जानती है, जड नही जानता जगत् मे जो पानी बनाया गया वह एक आउंस ऑक्सिजन ओर दो आउंस हैड्रोजन मिलनेसे बना हुवा है. (H2O) Chemistry रसायन शास्त्र में समष्टि प्राणको ऑक्सिजन कहते है. समष्टि व्यान को हैड्रोजन कहते है. समष्टि उदान को स्टीम कहते है. जलवाष्प पानीके भाप को कहते है. समान वायू के विषयमें सायन्समें विचार किया नही है. तब जड पदार्थनमें बुध्दि नही है ओर बुध्दिबिन गणित रहता नही है. जैसे एक,दो,तीन ऐसे तीन पदार्थ है. वे पदार्थ अपनेको नही जानेंगे, वरन् बुध्दि जानेगी. अब मै गणितकी रितीसे ईश्वर सिद्ध करता हूँ .इसका कोई खंडन नही कर सकता . गणित बुध्दि के बिना रहता नही .अब जगत् मे जब पानी उत्पन्न हुवा , तो वह पानी दो माप हैड्रोजन ओर एक माप ऑक्सिजन मिलके बना या नही? यह कैसे बना? सृष्टिनियम से बना ऐसा माने तो ऑक्सिजन वा हैड्रोजन ये जो जडपदार्थ है, इनको बुध्दि मानना चाहिये ; नही तो बुध्दिवंत ने बनाया ऐसा मानना चाहिये. बुध्दिवंत माने तो जीव से यह बने नही क्योंकि जीव अल्पज्ञ है. तो वह बुध्दीवान् कोई तो भी जीव से बडा होना चाहिये .वही हमारा ईश्वर है. इसप्रकार करके धीर पुरुष जो होते हैं वे नास्तिकनके मतोंको देखिके मोहको नाहि प्राप्त होते हैं. काहेते ? वस्तू प्रत्यक्ष भी हुई तो वह आठ प्रकार के खटकेसे याने प्रतिबंधसे दिखती नही . इसवास्ते वह नहीसी नही होती . ---=:: का रि का ::=--- १अतिदूरात्सामिप्यात्२ । ३ इन्द्रियघातान्मनोनवस्थानात् ४ ॥ अतिसूक्ष्मात् ५ । ६व्यभिचारादभिभवात् ७ । समानाभिहाराच्च ८ ॥१॥ १. ) अतिदूरात् :- पदार्थ अत्यंत दूर होनेसे दिखता नही .यह दूर त्वरूपी खटका हैं. तुम्हारा पुत्र घरमें है,परंतु यहाँसे तो दिखता नही ; तो क्या वह नही कहना चाहिये ? २.) सामिप्यात् :- अति नजीककी भी वस्तू दिखाई देती नही हैं. आँखोंमेंका अंजन दिखता नही. जो मूढ़ , दिखती वही वस्तु हैं , तो अंजन भी दिखना चाहिये . नही तो उसके आँखिमें अंजन नहीं कहना चाहिये . ३.) इन्द्रियघातात् :- इन्द्रियका घात होना यह भी एक खटका है. कान फूटा होवे तो शब्दको नाहि सुनता हैं. यह नास्तिकनका ओर एक संशय है. वे कहते हैं, कि हमको नहीं दिखा तो क्या हुवा , किसीको तो भी दिखता हैं या नहीं ? तो उनको ऐसा पूछिये कि दूसरेको दिखा तो तुमको क्या प्रमाण ? वे कहेंगे कि, उसका कहना प्रमाण है तो यह शब्दप्रमाण हुवा . प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं हुवा । भला , तेरा मन तेरेको दिखता हैं या नहीं ? तेरेको तेरा मन दिखता नही ; वैसा किसीको को भी दिखता नहीं तो फिर मन हैं या नहीं ? मनको कबूल किया तो तू आस्तिक हुवा . ४.) मनोऽनवस्थानात् :- अपना ख्याल पदार्थनके ऊपर नहीं रहनेसे वस्तू होकर भी दिखती नही. इस वक्त तुम्हारा ख्याल मेरे तरफ था . तो किसीने ऊधर सरौता बजाया तो तुमको सुननेमें नहीं आया. ५.) अतिसूक्ष्मात् :- अति सूक्ष्मभी वस्तू होवे तो नहीं दिखती हैं . भाप होकर जब जल उड़ जाता हैं , तब सूक्ष्म होनेसे दिखता नहीं . ६.) व्यभिचारात् :- देर लगनेसे पदार्थ समझता नहीं . जैसा " घी दे " इस वाक्यको देरसे कहनेसे अर्थ कब समझेगा? "घी" कहॉं आज ओर "दे" कहॉं कल तो घरमें घी होते भी अर्थ न समझनेसे नहीं मिलेगा क्योंकि उसमें देर बहुत हुई. ७.) अभिभवात् :- दब जानेसेभी वस्तू दिखती नहीं . जैसे डब्बे में शक्कर रखी तो उपर ढक्कन होनेसे नहीं दिखेगी. ८.) समानाभिहाराच्च :- दो पदार्थ समान होनेसे भी दिखता नहीं . जैसा तुम भी गाते हो ओर दूसराभी गाता हैं ओर तुम्हारा गला ओर दूसरेका गला समान होवे तो समझता नही. ये आठ प्रकारके खटके परमेश्वर समझनेमे हैं . परमेश्वर है, परंतु इन आठ खटकोंमेसे किसी प्रकारका खटका रहनेसे दिखता नही. इन समस्त युक्तियनके मध्य एक युक्तिका खण्डन कोई नास्तिक नही कर सकता. इस युक्तीका खण्डन करनेहारा नास्तिक भूतकालमें हुवा नहीं , भविष्यकालमें होवेगा नहीं ओर वर्तमानकालमें विद्यमान नहीं . वह युक्ति यह हैं.:::===---****====---- "कौनसा भी पदार्थ हैं कहनेको उसकी पहिचान चाहिये , वैसा नही कहनेको भी पहिचान चाहिये . जिसकी पहिचान नहीं वह पदार्थ है या नहीं है ऐसा कोई भी नहीं कह सकता . जैसा तुम्हारा छोकरा हैं . उसकी तुमको पहिचान हैं. वह छोकरा यहाँ दिखता नहीं इसवास्ते नहीं ऐसा नहीं. वह यहाँ दिखता नहीं , पर हैं. तैसा ईश्वर नाहि कहनेवालोंको पूछे कि, तुमको ईश्वर का ज्ञान हैं या नहीं ? हैं कहे तो वादही नहीं . नहीं कहे तो ज्ञानही नहीं तो नही कैंसा कहता? एवं परमेश्वर नाहि कहनेवाले समस्त नास्तिकनके मतनका खण्डन किया. अब जो पुनर्जन्म नही मानते ओर आत्माको नहीं मानते हैं तिन नास्तिकनको खण्डन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं. जो ऐसे मूढ़ हैं कि पुनर्जन्म नहीं मानते उनको पूछे कि, जो तुम पुनर्जन्म नाहि मानते तो या जगत् में जो जो पदार्थ उत्पन्न भया हैं. उसको कुछ कारण हैं या बिनाकारण वह उत्पन्न भया हैं? जो मूढ़ कहे की , बिनाकारण ही सब उत्पन्न हुवा तो बिनाभोजन तृप्ति होना चाहिये , बिना मैंथुन प्रजा होनी चाहिये, या बिना जलपान प्यास जाना चाहिये , ऐसा क्यों नही होता? तो कारण मानना चाहिये . कारणसे उत्पत्ति हैं, तो उसको फिर पूछे ==- कारणसे जो कार्य उत्पन्न होवे तो कैंसा होवे? मूल कारणमे शक्ति नहीं होते कार्य होता तो बालुकासे भी तेल निकलना चाहिये या खंभेसे भी भैंस होना चाहिये ? वह तो नही होती तो फिर कारणमें शक्ति होना कबूल करो. कबूल नहीं करेगा तो पूर्वोक्त दोष आवेंगे फिर बालुकासे तेल निकलना चाहिये . तमाखूके बीजसे आमके झाड़ उगना चाहिये . कोई कहे कारण मे शक्ति है तो दिखती क्यो नही? वह शक्ति कारणमें अभिभूत हैं. याने छिपी है. करके दिखती नही. डब्बमें ढक्कन लगा हैं. तो पदार्थ दिखता नही. वैसा , फेरि जो आत्मा नही मानते उनको पूछें की , बालक जब उत्पन्न होता तो उस बालकमें आत्मा है या नही ? आत्मा नही तो दूध पीनेका ज्ञान उनको नहीं होना. बिना आत्मा दूध पीनेकी इच्छा नहीं होती , इसवास्ते आत्मा मानना अवश्य हैं . आत्माको माना तो पूर्वसंस्कार भी मानना चाहिये . पूर्वसंस्कार नहीं रहा तो ज्ञानभी नहीं रहता . यह दुर्गा मालपुआ बनाना नही जानती क्योंकि पूर्व अनुभव नही. वैसे पूर्व अनुभव बिना बालकको दूध पीनेकी शक्ति कैसी आवेगी ? पूर्व अनुभव बिना शक्ति माने तो बिना भोजन तृप्तिकी नाई दोष आवेगा . कोई कहेगा कि पूर्व जन्म है तो स्मृति क्यो नही. तो उसको हम पूछते है कि, बालपन के खेल भी याद नहीं आते , तो बालपन भी नहीं मानना चाहिये . तात्पर्य श्रुतिमाताके सामने खड़े रहनेकी किसीकी भी शक्ति नही है. यह बड़े विचारी नास्तककी बात हुई . सब शास्त्रनको जानके जो नास्तिक भये तिनकी बात हुई.अब आधे नास्तिक का खंडन करता हूँ. इस इंग्लिश राज्यमें जो नास्तिक है वे समस्त आधे नास्तिक ही है. कोई पूरा नास्तिक होवे तो सामने आना . वाद करनेको मै तैयार हूँ. आधे नास्तिकनकी चमत्कार के ऊपर निष्ठा होती है. उनका सिध्दांत ऐसा है कि, चमत्कारसे हम ईश्वर मानेंगे . उनको हम पूछते है कि, चमत्कार नाम काहेगा है. जो एक आदमीको आवे उसका नाम चमत्कार है या बहुत आदमी को आवे तिसका नाम चमत्कार है? सर्वथा ? लौकिक वस्तुका नाम चमत्कार है या सर्वथा अलौकिक वस्तुका नाम चमत्कार है. या कोई लौकिक ओर अलौकिक वस्तुका नाम चमत्कार है. वा सर्व अभाव का नाम चमत्कार है? थोडी जगह में जो वस्तु व्यापक है उसीको लोग चमत्कार कहते है. वही वस्तु बहुत व्यापक होनेसे चमत्कारत्व नष्ट होवे है. जैसे है- कृत्रिम बिजली के दिपक(electric lamp) को देखकर लोग चमत्कार को प्राप्त होते है. वरन् ऐसे हजारो बिजली के दीपकमेभी सूर्यप्रकाश बहुत बढ़ कर है. परंतु वह चमत्कार नहीं मानते. काहेते ? सूर्य रोज देखनेकी टेव पड़ गई है . तो बडे वस्तुका नाम चमत्कार नहीं है. कोनेमे पडे हुवे कोई क्षुल्लक वस्तुकाही नाम चमत्कार है.
Sunday, 8 March 2015
॥॥॥॥ आर्यधर्म विचार पध्दती ॥॥॥
पुष्कळ वेळेला जेव्हा काही गोष्टी सांगतो तेंव्हा त्यापैकी काही सोपपत्तिक म्हणजे rational व काही अनुपपत्तिक म्हणजे irrational असतात. मनाला खरोखर विचारले की जितक्या सोपपत्तिक गोष्टी तितक्या खऱ्या व अनुपपत्तिक तितक्या सर्व खोट्या असे म्हणण्याची तुझी छाती आहे काय? तर ते नाही असेच म्हणेल.कल्पना करा की जेव्हा law मध्ये पुरावे द्यावे लागतात तेव्हा ज्याच्याकडून अधिक पुरावे तो पक्ष बरोबर म्हणतात.पण पुरावेच बरोबर आहेत कशावरून? त्याचप्रमाणे हे पुरावे असे वाटणाऱ्याला भ्रम झाला नसेल कशावरून? अमुक एक मनुष्य दिवसा जेवीत नाही व लठ्ठ दिसतो , ह्यावरुन तो रात्री जेवीत असला पाहिजे असे अनुमान काढले तर काही वातरोगातहि ही स्थिती होत असते म्हणून सोपपत्तिक नेहमी बरोबर असते असे म्हणतां येत नाही. आपल्या मनात काही गोष्टी असतात व त्याच्याशी जुळून एखादी गोष्ट दिसली म्हणजे ती सोपपत्तिक आहे असे आपण म्हणतो.जेव्हा एखाद्या सिध्दांतास आपण उदाहरण मागतो तेंव्हा आपल्याला माहीत असलेल्या गोष्टीचेच आपण सादृश्य मागत असतो. पृथ्वी वाटोळी आहे व ति आपल्या भोवति फिरते असे सांगण्याकरिता आपण एक गोळा घेतो व त्याला सुई टोचुन अशा रितीने फिरते म्हणून सांगतो.पण ह्या पध्दतीत दोष आहे .त्यांने सिध्दांताची बरोबर कल्पना येत नाही. फक्त एका देशाची काय ती कल्पना येते. तेवढ्या दृष्टांतावरुन सिध्दांताचा दुसरा देशहि बरोबर असेल असे सांगण्यास काही एक आधार नाही.तर्काचें हि असेंच आहे. जेव्हा आपण तर्क करतो तेव्हा पदार्थांच्या सर्व बाजू सिद्ध करीत नाही.जसे man is mortal ह्या सिध्दांतात पुष्कळ भाग श्रध्देचाच आहे.man is mortal हे आपण पुर्व अनुभवावरून ठरविले पण पुढे असेंच राहील त्यास काही पुरावा नाही.सारांश आपण अज्ञात अंशावरच पुष्कळ वेळा चालत असतो.आपण उपपत्तिच्या योगाने ठाऊक असलेला एक देशच सांगतो व ते जुळून आले म्हणजे सोपपत्तिक म्हणतो व जे आपल्याला ठाऊक असलेल्याशी जुळत नाही त्यास अनुपपत्तिक म्हणतो.आपणास ज्ञात असें फारच थोडे आहे.तसेच आपणास काल हाहि फार थोडा ज्ञात आहे. तेवढ्यावरुन जेव्हा आपण पर्वताएवढा काल स्थापन करतो तेव्हा धाडस होते.ह्यांतील अज्ञात काल आपल्या संशयांत पडलेला वाटतो परंतू काही गोष्टी अशाआहेत कि त्यापुढे बदलतील.ह्या विषयी संशय घेता येत नाही.कारण आजच मनाला काही गोष्टी बरोबर समजलेल्या असतात व काही अंशमात्र समजतात. अंशमात्रांत पुढचा काळ संशयांत असतो. ह्या अंशवात् पदार्थांचा विचार करावयाच्या दोन पध्दती आहेत. एक स्वकीयांची व दुसरी परकीयांची , परकीयांची पध्दती कार्यापासून कारणाकडे जाण्याची आहे व आपली कारणापासुन कार्याकडे व फिरून पुन्हा कार्यापासून कारणाकडे जाण्याची अशी आहे . कार्य तेवढे बरोबर आहे असं दोघेही मानतात. फरक हाच की कार्यावरून अनुमान करणारे असतात त्यांना कार्याचा साक्षात्कार असतो व कारण अनुमीत असते. दुसऱ्यांना दोन्हीही साक्षात असतात. झाड पाहिले म्हणजे येथे एखादे बीज पडले असावे व त्यापासून हे झाड झाले असावे असे वाटते. त्यात झाडं हे प्रत्यक्ष असून 'बी' अनुमीत आहे. परंतु झाडं लावणाऱ्याला बी व झाडं दोन्ही साक्षात आहेत . चिखल पाहिल्याबरोबर बदली (ढग) आली असावी व पाऊस पडला असावा असे वाटते त्यात चिखल साक्षात असून बदली ही अनुमीत आहे. परंतू ज्याने बदली पाहिली व पुढे चिखल पाहिला त्यास दोन्ही ही साक्षात आहेत. ह्याचा अर्थ असा नाही की ज्याला कारण ठाऊक असते त्याला कार्यही प्रत्यक्ष असते तर जेव्हा कारण माहित असते व पुढे कार्य होते तेंव्हा त्याला कार्य व कारण दोन्ही साक्षात असतात. कार्यावरून कारणाचे अनुमान करणारास फक्त कार्यच साक्षात असते. जे ज्याचे कारण ठरलेले असते त्यापासून पुढे त्याचे कार्य होईलच असा केव्हा केव्हा निश्चय नसतो . परंतू एकदा कार्य झाले म्हणजे ते त्याच कारणापासुन होत असते. बदली (ढग ) आली म्हणून पाणी येईलच असा निश्चय करता येत नाही. परंतु पाऊस आला तर तो बदलीनेच (ढगानेच) येत असतो. सारांश कारणापासुन कार्य होईल ह्याचा संशय असला तरी कार्य झाले तरी तेच कारण आहे असा निश्चय असतो.Scientists कार्यावरून कारणाचा विचार करतात. आपल्याकडेहि नैय्यायिकांची हीच पध्दती आहे. कार्यावरून कारणाचा विचार करणाऱ्याची बुध्दी बालिश असायला पाहिजे.त्यानां कारणमाहित नसते ज्याचें आपल्यालाExplanation देता येत नाही ते जर दुसऱ्याने दिले तर तो बुध्दीमान आहे असें आपण म्हणतो.Explanation म्हणजे समोर असणाऱ्या गोष्टीचीं कार्य कारण श्रृंखला दाखविणे.पुढे आलेले पदार्थ काही explanation देत नसतात तर जेव्हा सामान्य कारण समजते तेव्हाच तेexplanation होते. जेव्हा वैद्य अरुचिचे explanation देतो तेव्हा तो तिचे कारणच सांगत असतो . ह्याप्रमाणे जो जास्त कारणवेत्ता तो अधिक बुध्दीमान व कमी कारणवेत्ता तो कमी बुध्दीमान ठरतो. केवळ कार्यवेत्याला बुध्दीमान म्हणत नाहीत . अलंकार नुसते माहीत असून ते कशाचे आहेत हे माहीत नसले तर तो बुध्दीमान नाही . अरूचि वैद्यास व रोग्यास सारखी माहीत असते ; परंतु रोग्यास तिचे कारण माहित नसते व वैद्यास ते असते म्हणूनच कार्यवेत्याला बुध्दीमान म्हणत नाहीत . आपण जेंव्हा कार्यापासून कारणाचा विचार करतो तेंव्हा त्या विचारात बालिशता असते. अशा रितीने विचार करतांना आपण कार्याचे विभाग करतो किंवा त्यालाanalyse करतो पुस्तकाचा विचार करत असतांना आपण त्याचे बालीश बुध्दी ने तुकडे करतो व अशा रोतीने तुकडे करीत करीत शेवटी एखादा तुकडा मनात ठेवतो, व त्याला परमाणू असे म्हणतो. हे परमाणू एकत्र जमविले म्हणजे त्यांचे कार्य होते असे आपण म्हणतो ही नैय्यायिक वscientists यांची पध्दती आहे . ह्या पध्दतीने एका गोष्टीचा निकाल लागते नाही . संख्या व जाती ह्याची पदार्थ समजण्यास फार जरूरी आहे . व कार्यावरून ह्या समजत नाहीत. संख्येचा विभाग होत नाही . एका पदार्थांचे तुकडे केले तरी शेवटच्या तुकड्यास आपण एकच म्हणतो . किंवा एका पदार्थातून काही भाग कितीहीदा जरी उणे करीत गेलो तरी उरलेल्या विभागास आपण एकच म्हणतो . आपण पदार्थांचे लहान लहान तुकडे करून अणुत्व जाती परमाणू आहेत असे म्हणतो . जाती ज्ञानाने बरेच काम होते . काष्ठत्व जाती स्थापन केल्यामुळे हे व्यासपीठ लाकडाचे आहे असे आपण म्हणतो . नाहीतर ह्यास लाकडाचे व दुसऱ्यास कशाचे तरी म्हटले असते . हे जातीज्ञान काय आहे? व्यक्तिवरच जाती अवलंबुन आहे असे म्हणता येत नाही. कारण व्यक्ती जातीचे दृश्य(Picture) मनात आणून देत नाही . सादृश्याचे ज्ञान व्यक्तीवरून होत नाही . तर ते आपण मनानेच जुळवून घेतो. सादृश्यावरून जाती ठरवतो ह्यांत चूक होते. आपण व्यक्ती ठरविण्यात विसदृश गुण मनात घेतो व सदृश गुणांकडे दुर्लक्ष करतो आणि जाती ठरविण्यात आपण सदृश गुणांकडे लक्ष देतो व विसदृश गुणाचा परित्याग करतो . ही चूक नैय्यायिक व Scientists ह्या दोघांच्याही लक्षात आली नाही. पुष्कळ जण म्हणतात की जाती व्यक्तीचा अनोन्याश्रय आहे. ह्यांच्या मतेparticular हे general वर व general हेparticular वर अवलंबून आहे. पुस्तकत्व ठाऊक नसले तर पुस्तक म्हणता येणार नाही व पुस्तक माहीत नसले तर पुस्तकत्व समजणार नाही . पण हा अनोन्याश्रय आहे . हा दोष आहे. माझे स्वतःचे असे मत आहे कि, आपण काही गुणांकडे लक्ष देतो व तितकेच गुण ग्रहण करतो आणि त्यास पदार्थ असे म्हणतो .आपण पदार्थ आहे असे म्हणतो तेंव्हा विसदृश गुणांकडे आपण लक्ष देत नसून सदृश गुणांकडेच लक्ष देतो हे असे का होते हे सांगता येत नाही . पण असे होते मात्र खरे . असो, कारण हे काय असते ? जितकी कार्ये उत्पन्न होतात त्या सर्वात कारणाची अनुवृत्ति असली पाहिजे कारण नेहमी जातीला धरून असते ; व्यक्तीला धरून नसते . ते कधीच व्यक्तीला समीप नसते. आपण पेटीतून खांब झाला असे म्हणत नसून लाकडापासुन झाला असे म्हणतो . कार्यालाparticularise करीत असतो . म्हणजे कार्यातील Unity मोडतो. जातीत unity अधिक आहे .आपण जेंव्हा एखाद्या वस्तूचे परमाणू पाहतो तेंव्हा त्या वस्तूची unity मोडतो. अर्थात कार्यावरून कारणाचे अनुमान करण्यात त्या कार्याची unity मोडल्या जाते. आपण जी पदार्थास एकत्व संख्या देतो ती जातीलाच धरून देतो . व्यक्तीला धरून देत नाही . हजार माणसांचे घोळक्यास आपण एक समुदाय म्हणतो . तसेच आपण जेंव्हा एक मनुष्य म्हणतो तेंव्हा परमाणू मिळून झालेल्यासच एक म्हणतो. हे एकत्व जातीसच देतो .जेव्हा पदार्थातून काही व्यक्ति अलग करतो तेंव्हा आपण त्यांना नानात्व देतो. आपण पुस्तकास जेंव्हा नानात्व देतो तेंव्हा त्यातून काही व्यक्तीच काढत असतो. परमाणू मिळून व्यक्ती होते म्हणजे काय होते ? जातीचीच कल्पना जेंव्हा घट्ट होते म्हणजे पुष्कळ स्पेसमध्ये जी जाती ग्रहण करीत होतो ती जेव्हा एकाच थोड्या space मध्ये ग्रहण करतो तेव्हा ती व्यक्ती होते. अर्थात कार्य ही जाती झाली असे म्हणणे भाग पडेल . बरे असे मानले तर कार्यावरून कारणाचे अनुमान होते असे म्हणता येणार नाही. कारण व्यक्तीची कल्पना perception ने होते. अनुमानाने होत नाही . अनेक व्यक्ती मिळून जाति होते. असे माणले तर जिच्याविषयी व्यक्तीची कल्पना केली तशीच दुसरी व्यक्तिहि आहे कि नाही. असेल तर त्यांतील atoms दोन होते कि एक होता. दोन होते व सारखे होते असे मानले तर जाति घेतलीच म्हणजे कार्याचे वेळेला जाती आहे व कारण ही जाती आहे असे म्हणावे. म्हणूनscientists व नैय्यायिक पध्दतीत दोष आहे.आता आपण कारणाची कल्पना जातीवर ठरवू. जाती कारणवादी plato किंवा आपणाकडे सांख्य आहे सांख्यांचें म्हणणे असे आहे कि निरनिराळ्या वस्तुंचे निरनिराळे परमाणू नसून तें एकाच वस्तुंचे विभाग आहेत. ElectronicTheory ह्याच पध्दतीची दिसते.J.J.Thompson म्हणतो जे electrons hydrogen मध्ये आहेत तेच oxygen मध्येही आहेत. त्याने हे आपले म्हणणे अल्फा, बीटा व XRays ने सिद्ध केलेआहे. तो म्हणतो electrons हे विवक्षितdirection मध्ये आले म्हणजे निरनिराळे पदार्थ भासतात. सांख्य ह्यांच्याहि पुढे गेले आहेत.ह्या theory मध्ये एकाच वस्तूच्या परमाणू चे हे जगत् मानले आहे.ह्यांचेelectrons इतके सूक्ष्म आहेत की जर एक atom पृथ्वीएवढा मानला तर त्यामानाने एकelectron चेंडू एवढा होई. ही एक atomic theory आहे. पण हे electrons एकाच वस्तूचे आहेत असे म्हणण्यात त्यांच्यामध्ये जो निरनिराळेपणा होतो तो का होतो ह्याचे उत्तर ह्या theory ने देता येत नाही. निरनिराळे electrons मानले तर त्यामध्ये space असली पाहिजे. ती space काय आहे हे त्या theory ने सांगता येत नाहि. सांख्य म्हणते जाति व space ह्यात फारसा फरक नाही. कारण space ला existence तर आहेच . बरे ती जर व्यक्ति मानली तर ती finite (मर्यादित) आहे असे मानावे लागेल. त्याअर्थी space चा जातीतच अंतर्भाव करणे योग्य आहे.आता matter (पदार्थ) व ही space (पोकळी) ज्याचेपासून प्रतीत होते ती जाती होय, झाले व ह्या जातीलाच सांख्यांनी प्रकृति म्हटले आहे . हे म्हणणे वरील theory पेक्षा बरेच सयुक्तिक आहे .तथापि जातीपासून व्यक्ती कशी होते हें सांख्यांला दाखविता येत नाही . ह्या पध्दतीतहि कार्यावरूनच अनुमान केल्यासारखे दिसते . एक वेदांत पध्दतीच काय ती कारणापासुन बरोबर कार्याकडे येते. वेदांतात सत्व,रज,तम हा भाग सांख्यातूनच घेतला आहे. तथापि त्यात दुसरी एक पध्दती आहे. वेदांताचे मताप्रमाणे एक ब्रम्हच असून ते अज्ञानाने आवृत्त आहे. ब्रम्हावरील जितके अज्ञान नाहीसे होते तितके ब्रह्म स्पष्ट होऊन ते पदार्थरूपाने भासते. कमी अज्ञान निघाले तर तेच ब्रह्म पदार्थ होते व सर्व निघाले तर ब्रह्मरूपाने दिसते. ज्याप्रकारे प्रकाश ज्या ज्या आकाराच्या छिद्रातून काढला त्या त्या आकाराचा होतो. त्याप्रमाणेच पदार्थ दिसते वेळी ब्रह्माचेंहि होतं असते. मन जातीकडे धावते तेव्हा विसदृश गुणांकडे लक्ष देत नाही .त्यामुळे सामान्य चैतन्यावरील अज्ञान दूर होऊन ब्रह्म जातीच्या आकाराने दिसते व व्यक्तिकडे धावते तेव्हा विसदृश गुणांकडे लक्ष देते . त्यामुळे तितकेच अज्ञान दूर होऊन व्यक्ति दिसते . आपण पदार्थाकडे पाहतो तेव्हा आपणास ब्रह्माच्या एक देशाचे ज्ञान होत असून बाकीच्या सर्व देशांचे अज्ञान असते. संसार - ज्ञान हे ब्रह्मज्ञानच होय. कार्यकारणभाव हा पदार्थात नाही. आपण जेव्हा कारण म्हणतो तेंव्हा सारखेपणाकडे लक्ष देतो व विसदृशाकडे दुर्लक्ष करतो व कार्य म्हणतो तेंव्हा विसदृशपणाकडे लक्ष देऊन सारखेपणाकडे दुर्लक्ष करतो.एकंदर कार्यकारणाची ही अशी स्थिती आहे .वस्तुतःकार्य म्हणून काही एक नसुन कारणच आहे व ते अज्ञान होय .ते जितकें दुर केले तितकें ब्रह्म दिसून तें पदार्थाकार भासते. अज्ञान नानाप्रकारचे आहे. सत्व, रज , तम हे त्याचे प्रकार होत. मनाचे ठिकाणी सत्वच फार आहे. कारण ते चैतन्याचे अगदी जवळ आहे. विकार मनात आल्याबरोबरच त्यावरील आवरण लौकर निघते.रज हे सत्वाइतके चैतन्याचे समीप नाही. त्यावरील आवरण निघते पण लौकर निघत नाही. तमांत आवरण फार आहे . त्यात आपण इंद्रियांची मदत घेउन आवरण दूर करीत असतो व नंतर पदार्थ दिसतात . जेव्हा पदार्थ भासतात तेंव्हा त्यात space चे आवरण असते. space म्हणून काही एक नसून जेंव्हा आपण ब्रह्मावरील किंचित आवरण दूर करतो व तितक्यापुरते ब्रह्म पदार्थाकार भासते. तेव्हा त्याहुन बाकीच्या चैतन्यावर आवरणच असते व ते आवरणच म्हणजे space होय. सारांश दुर्लक्ष असलेला चैतन्याचा भागच space होतो. तसेच time म्हणून काही एक नसून जेव्हा बुध्दि एकामागून एक आवरण दूर करते तेंव्हा त्यात जे distance वाटते तीच time होय. एकंदरीत space,time & matter हे अज्ञानाचे कार्य होय. हे meditation ने संपूर्ण दूर होते तेंव्हा मनुष्य मुक्त होतो.
Saturday, 28 February 2015
या ब्लॉगचा उद्देश आर्य धर्माची सत्य ऒळख व्हावी या सद्हेतुस्तव
या ब्लॉगचा उद्देश आर्य धर्माची सत्य ऒळख व्हावी या सद्हेतुस्तव झाला आहे .येथे कोणत्याही अन्य धर्माची तत्वमुल्यं अपमानीत करणे हा या ब्लॉगचा हेतू नाही . कोणत्याही विशेष जातीसमुदायाला किंवा धर्माला विरोध करून द्वेष पसरवणे हा संकुचित दृष्टिकोन नाही .तर सर्व धर्माचा समन्वय साधुन परस्पर विद्वेषाची भावना नष्ट करून बंधुत्व वाढीचा प्रयत्न करणे हा आहे. कृण्वंतो विश्वंमार्यम् !!! सर्व प्रथम आपण आर्य या शब्दाची व्याख्या पाहू "आर्य" हा शब्द गुण वाचक आहे . म्हणजे आर्य त्याला म्हणावे जो सत्व,संयम,शांत, अहिंसक आणि ज्ञान हे गुण असणारा तसेच विवेकी बुद्धी,श्रद्धावान आणि आस्तिक आसणारा तो आर्य समजावा .आता धर्म म्हणजे काय ते पाहू .स्वार्थ -हिंसा -कपट -द्वेष -इ.तामसी वृत्ती तथा चंचलता इ.राजसिक गुणांना परास्त करून सत्वगुण वाढवणारा धर्म आर्यधर्म आहे.
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