Tuesday, 23 August 2016

तथाकथित मानवतावादी लोग और मिथ्या Peaceful Organization

आजकल कोई भी उठता है और मानवता का धर्म खतरे में है, मनुष्य को उसके असली धर्म की और लौटना चाहिये ऐसी चिपडीचुपडी बातें बताकर अपना मत ,पंथीय विचारधारा थोपने का प्रयास कर रहा है । वेदो में और उपनिषदोमें ये मानव कल्याण की बात ही कहि है ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:।। अर्थ : हे परमात्मन् ! आप हम दोनों गुरू और शिष्य की साथ- साथ रक्षा करें , हम दोनों का पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-साथ शक्ति प्राप्त करें,हमारी प्राप्त की हुई विद्या तेजप्रद हो, हम परस्पर द्वेष न करें, परस्पर स्नेह करें। (कठोपनिषद(२/३/१९) वैसै मनुष्य वैसेही शांत है पर जब उसमें बाह्य रुप में धर्म का विचार आता है तो अशांत अधिक होता है और आंतरिक रुपसे अहंकार आता है तो भी अशांत होता है ...ये मनुष्य जिस तत्व से अपने अहंम को पकडेगा उसको उतनाही अशांत पृष्ठभुमी का मौका मिलेगा । तो ये मनुष्य में शांती की भावना तभी संभव है जब मनुष्य के मानवीय मुल्योंको महत्व दिया जाय और मानवीय मुल्य सत्य,अहिंसा,प्रेम,करूणा,दया,मैत्री,बंधुता,सौहार्दता ,आनंदमयी भाव इनकी वृध्दीसे मनुष्य का जीवन अमृत से भरता है । अमृतस्य पुत्रः ये उपनिषद का कथन है और ये किसी व्यक्तिगत का कथन,अभिप्राय या अहंम नहीं है ये हर एक को आनेवाली साक्षात अनुभुती है । इसी जीवन में सर्व दुखः बंधन से मुक्तता और दुःख से निवृत्ती मनुष्य के जीवन का परम ध्येय है । तभी मनुष्य शांतता के स्वाद का अनुभव ले अभी और यही ले सकता है और उसका जीवन सार्थक सफल और धन्य हो जाता है । हिंदू के अनगिनत संतो ने इसका अनुभव अपने जीवन में किया है । इसलिए peace लाने की बजाय peace क्या है ये समझना प्रत्येक मनुष्य का काम होना चाहिये । मनुष्य जो खुद अशांत और unpeaceful है वह दुसरे के बाबत peaceful ता की आशा करे ये सही कार्य नहीं है । और ना ही इससे मनुष्य peacful और मानवता का अनुपालन कर सकेगा ...ये मेरे वैयक्तिक विचार है और किसीपर थोपने के लिये नही है ।क्योंकि मैं शांत हुँ और आनंद से भरपूर हुँ । (विनोद मराठे)